Saturday, December 12, 2009

बातें हैं अपने मन की

कौन आता है इधर ,
कौन जाता है उधर
ये तो बातें हैं अपने मन की
बातें हैं अपने मन की
इशक करना खेल नहीं गुड़ियों का
न ये प्यास है भूके तन की
ये तो बातें हैं अपने मन की
प्यार होता जिसे
वो यूँ रुकता नहीं
आंधी में कभी तुफानो में
ना वो parvaa करे जीवन की
ये तो बातें हैं अपने मन की

Wednesday, November 25, 2009

मेरी आदत नहीं

वैसे पीने की मुझे आदत तो नहीं
कोई पिलाये तो पी भी लेता हूँ
आँख मीच के चलता हूँ नहीं
बे वजह कुछ देखता भी नहीं
कोई दिखाए तो देख लेता हूँ
बात आती है मुझे ,पर मैं बातूनी नहीं
कोई बतियाये तो बात बता लेता हूँ
हूँ शौकीन खीलाने खाने का
दोस्तों को दिल मैं बिठाने का
रूठों को दिल से मानाने का
रोतो को फिर से हँसाने का
मैं हूँ साबुन मानो नहाने का
मन कीमैलछुडानेका
मुझे नहाने की कोई जरुरत भी नहीं
बुरी आदत है ;रोज नहा लेता हूँ /

Tuesday, October 27, 2009

गीत

आज जितने फूल खिले हैं
फूल खिले हैं सब चुन लो तुम
कल फिर गुलशन में उतने ही फूल खिलेंगे
पतझर से घबराना ना जाना ओ माली
आने दो मधुमास ये फिर खिल उठेंगे
सूरज को ढलते देखा है सबने
चंदा को उगते देखा है सबने
पर ना शासन किसी एक का चल पता है

Monday, October 26, 2009

Thursday, October 22, 2009

Totke ka deepak |

प्राचीन महल का वैभव
खंडहर में बदल गया है
कभी तन के खड़ा था
हिमालय सा
आज रेत के पर्वत सा
बिखर गया है
उसकी इस दशा पर
सभी तो मौन हैं
कुछ हमदर्दी दिखाएँ
साथ में दो आसूं बहायें
ऐसा इस अपनो की दुनिया में
बताओ तो भला कौन है
मैं हमदर्दी हो सकता हूँ
थोड़ा साथ दे सकता हूँ
पर आंसू बहाने को मुझसे मत कहना
मेरे आंसूं सुख चुकें हैं
कुछ जमा है फिक्स डेपोसित में
ताकि अपनी ही मौत पर फूल न चढ़ा सकूं
बाज़ार से खरीदकर
तो अपने आंसू तो बहा सकूँ
हाँ, मेरा स्नेह नही हुआ समाप्त
तुम ले लो इसको
क्यूँ की चौराहे की हवा
अब सहन नही होती
मेरी लौ होती है विचलित
होती है कम्पित
मेरा स्नेह अभी नही हुआ समाप्त
तुम ले लो इसको
तुमको करना है प्रकाशित
अतीत के वैभव को
मेरा क्या!
मैं तो टोटके का दीपक हूँ
मेरा बुझ जाना ही अच्छा!
लो! मैं बुझता हूँ।

Ssth -sath

Rat nahin gar hoti sajni
kya subah yon hi aajati
andhiyara na hota bhu par
ujiyare ko samajh na pati
andhiyare ko ujiyale se
ujiyale ko andhiyare se parkho
dono hi to sath sath hain
nain khol kar nirkho;

Raj ki bat

raj ki hai bat
ki din aour rat
kisi ne na dekhe honge sath sath
par kal ki hi bat
jab na din tha na thi rat
maine dekha hai
dono ko sath sath
din aour rat ;

दोहे

लेन देन से होत है मुश्किल सब आसान;
लेन देन जब से चला निर्भय हर इन्सान
भृष्ट bhrisht मत रोइए ये अब है शिष्टाचार
तुम ने diya ham ne liya to kahan hai bhrishtachar
bhrisht na pyada hot hai bhrisht na thulla yar
afasar ke ghar men jhako saja hai bhrishtachar
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man teerath men naha liya teerath man ho gya
ab man kis se kya kahe man to aman ho gya ;

Friday, October 16, 2009

दो कवितायें

दीप हूँ पर ज्योत मेरी बुझ् चुकी है

स्नेह भरा है बात लेकिन जल चुकी है

ले सको तो स्नेह ले लो बात मत रखना ह्रदय पर

रत भर जलता रहा हूँ अब न जलना चाहता हूँ

दो

मैं तो रिता दीपक था

कोने कचरे में पड़ा हुआ

किस कोमल कर ने मुझे उठा कर स्नेह भरा

श्वेत धवल कोमल कपास से बट कर बाती

किसने सजाई मेरी छाती

और जगा दी ज्योत

मुझे अब जलना होगा

जब तक जीवन शेष

तिमिर से लड़ना होगा